हिन्दुओं के सोचने के लिए

अगर हिन्दू धर्म को मानने वालों का अयोध्या के राम मंदिर में भ्रष्टाचार उजागर होने के बाद भी हिन्दुत्ववादी संगठनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी समेत उसके तमाम अनुषांगिक संगठनों से मोहभंग नहीं हुआ है तो उन्हें जरा गहराई से सोचने की जरूरत है।

हिन्दू धर्म सनातन है इसमें कोई दो राय नहीं। रा. स्व. सं. की स्थापना हुई 1925 में जिसकी हिन्दुत्ववादी विचारधारा का आधार मुस्लिम और ईसाई विरोध था। अब हिन्दुत्ववादी अपने को सनातनी कहने लगे हैं। सोचिए जब ईसाई धर्म और इस्लाम धर्म धरती पर आए ही हिन्दू धर्म के बाद हैं तो 1925 में जन्मी विचारधारा को मानने वाले अपने को सनातनी कैसे कह सकते हैं? अब आपको तय करना है कि आप सनातनी हिन्दू हैं या हिन्दुत्ववादी हैं? सनातन धर्म तो आदिकाल से चला आ रहा है। भारत में कई धर्मों को मानने वाले आए, कुछ राज करने, कुछ व्यापार करने और कुछ शरण लेने। लेकिन फिर भी भारत के ब़ड़े भाग ने हिन्दू धर्म को जीवित रखा। यह तो हिन्दू धर्म की भेदभाव आधारित जाति व्यवस्था थी जिसकी वजह से कई लोग ईसाई और मुस्लिम बन गए और इसी वजह से बौद्ध और सिक्ख धर्मों का उदय भी हुआ। लेकिन हिन्दू धर्म की सहिष्णुता ने सबके साथ तालमेल बना लिया। पिछले कुछ दशकों की राजनीति से हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण जरूर हुआ है लेकिन फिर भी हिन्दू-मुस्लिम सामाजिक ढांचे की वह हालत नहीं हुई है जो मणिपुर में मैतेई व कुकी या कुकी व नागा के बीच हो गई है।

जो धर्म स्वयं की गतिशीलता से जीवित रहा क्या 1925 में पैदा हुई कोई विचारधारा उसे बचाएगी? बल्कि उसने सहिष्णु हिन्दू के अंदर कट्टरता भरकर उसके मूल चरित्र, जिसकी वजह से उसका धर्म जिन्दा है, को ही बदलने की कोशिश की है। यह समाज और हिन्दू धर्म के लिए कितना खतरनाक है इसे बताने की जरूरत नहीं है। दुनिया का इतिहास उठा कर देख लीजिए, कट्टर समाज कहीं भी खुशहाल नहीं रह पाया है।

अयोध्या में राम मंदिर बनाना हिन्दुत्ववादियों का राजनीतिक कार्यक्रम था जिसका मकसद भारत की सत्ता हथियाना था ताकि वे भारत को हिन्दू राष्ट्र बना सकें। अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहा कर वे अपने मकसद में सफल हो गए। रहा सहा काम सर्वोच्च न्यायालय ने कर दिया और विवादित स्थल पर राम मंदिर बनाने की अनुमति दे दी। हलांकि उसी फैसले में यह भी कहा गया कि उनके सामने कोई ऐसे साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए कि राम का जन्म उसी स्थान पर हुआ हो और बाबरी मस्जिद ढहाए जाने को उन्होंने आपराधिक कृत्य बताया। लेकिन तब तक हिन्दुत्ववादियों ने देश का माहौल राम मंदिर के पक्ष में बना लिया था। अतः आनन फानन में मंदिर खड़ा भी हो गया। लेकिन मंदिर के उद्घाटन कार्यक्रम में एक भी शंकराचार्य नहीं आए क्या यह सोचने का विषय नहीं है?

चूंकि अयोध्या में बना राम मंदिर एक राजनीतिक मकसद को पूरा करने के लिए बनाया गया था इसलिए वास्तव में हिन्दू धर्म के प्रतिनिधियों ने उससे दूरी बना कर रखना ही ठीक समझा। मंदिर का संचालन भी धार्मिक लोगों के बजाए रा. स्व. सं. से जुड़े संगठनों को ही दे दिया गया। फिर जो हुआ सबके सामने है।

भा. ज. पा. ने राम मंदिर निर्माण को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया और उसका उसे चुनावी लाभ भी मिला। लेकिन जिस मंदिर की नींव में ही नैतिकता नहीं थी उसकी पोल आज नहीं तो कल खुलनी ही थी।

जो लोग साथी मनुष्यों व अन्य जीवों को छोड़कर पत्थर की मूर्ति या कागज के चित्र में भगवान खोजते हैं वे कभी न कभी तो धोखा खाएंगे ही। यह तो अच्छा हुआ कि अयोध्या के मंदिर की पोल जल्दी खुल गई नहीं तो कितने और राम भक्तों के साथ धोखा होता।

असल में देखा जाए तो मानव सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है क्योंकि जो स्थाई संतोष उसमें मिलता है वह और किसी चीज में नहीं। सिक्खों के गुरूद्वारों में लंगर की महान परम्परा है। विशेष बात यह है कि वहां किसी की जाति या धर्म नहीं पूछा जाता। सभी इंसानों का स्वागत होता है। न गुरू ग्रंथ साहिब पर मत्था टेकने की शर्त होती है। भविष्य के धर्मों और धार्मिेक स्थलों का यही स्वरूप होना चाहिए। किसी भी धार्मिक स्थल में सभी धर्मों को मानने वालों का स्वागत होना चाहिए, न तो कोई अनिवार्यता होनी चाहिए, न कोई पाबंदी। हवाई अड्डों पर प्रार्थना कक्ष होते हैं, वहां यह नहीं लिखा रहता कि वह किसी धर्म विशेष के लिए है। कुछ धार्मिक स्थल धर्मार्थ शिक्षालय या चिकित्सालय भी चलाते हैं। यदि धार्मिक स्थल किसी भी मानव सेवा के कार्य में नहीं लगे हैं तो धर्म का क्या मतलब है? इससे यह भी सुनिश्चित होगा कि धार्मिक स्थल पर चढ़ावे का सदुपयोग होगा।

यदि हम जिस समाज में रहते हैं और उसमें दुखी लोग हैं तो यह तय है कि हम सुखी नहीं रह सकते। अच्छा होगा यदि हम अपना सुख पत्थर की मूर्ति या कागज के चित्र के बजाए जिंदा लोगों में ढूंढे।

लेखकः संदीप पांडेय

प्रधान महासचिव, सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया)

लेखक नास्तिक है। वह साथी मनुष्यों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए धार्मिक स्थलों में जाता है, लेकिन यह तय है कि अयोध्या के राम मंदिर में, जिसकी नींव में धर्म नहीं राजनीति है, वह कभी नहीं जाएगा।

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