लखनऊ, 8 अगस्त 2026: सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) ने लखनऊ प्रेस क्लब में “उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम के तहत ईसाइयों का उत्पीड़न” विषय पर एक सम्मेलन आयोजित किया। सम्मेलन में उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 तथा इसके 2024 के संशोधन के क्रियान्वयन की समीक्षा की गई, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में पादरियों, ईसाई धर्मावलंबियों तथा प्रार्थना सभाओं में भाग लेने वाले लोगों से जुड़े मामलों के संदर्भ में।
सम्मेलन में राजनेताओं, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, अधिवक्ताओं, धार्मिक प्रतिनिधियों तथा नागरिक समाज के सदस्यों ने भाग लिया। वक्ताओं में सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी एवं कारवां-ए-मोहब्बत से जुड़े हर्ष मंदर; ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल के पूर्व महासचिव जॉन दयाल; लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति प्रोफेसर रूप रेखा वर्मा; कैथोलिक एक्टिविस्ट पादरी एवं नाटककार फादर आनंद; कैथोलिक डायोसिस ऑफ लखनऊ के चांसलर एवं प्रवक्ता फादर डॉ. डोनाल्ड डिसूजा; इंडिया कैथोलिक फोरम के संयोजक छोटेबाई; तथा सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया), उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष अधिवक्ता सलाहुद्दीन शिबू शामिल थे। सम्मेलन की अध्यक्षता सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया), उत्तर प्रदेश के पूर्व अध्यक्ष अधिवक्ता मोहम्मद शोएब ने की। कार्यक्रम का संचालन मीनाक्षी मार्टिन सिंह और राजीव यादव ने किया।
मामलों के विश्लेषण से गंभीर सवाल
वक्ताओं ने जुलाई 2022 से जुलाई 2026 के बीच उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में पादरियों, ईसाई धर्मावलंबियों तथा प्रार्थना सभाओं में शामिल लोगों के विरुद्ध दर्ज मामलों का विश्लेषण प्रस्तुत किया।
विश्लेषण के अनुसार, इन मामलों में कई समान प्रवृत्तियां सामने आईं। निजी घरों अथवा किराए के परिसरों में आयोजित प्रार्थना सभाओं को कथित रूप से तीसरे पक्ष की आपत्तियों या शिकायतों के बाद बाधित किया गया। इनमें हिंदुत्ववादी संगठनों से जुड़े कुछ लोग भी शामिल बताए गए। इसके बाद कई मामलों में विधि विरुद्ध धर्मांतरण के आरोप में एफआईआर दर्ज की गईं, जबकि आयोजकों के अनुसार कुछ मामलों में वास्तविक धर्मांतरण होने का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं था।
कई एफआईआर में कथित रूप से समान प्रकार के आरोप पाए गए, जिनमें ईसाई धर्म का महिमामंडन करने, हिंदू धर्म को नीचा दिखाने, धर्मांतरण के लिए धन का प्रलोभन देने अथवा चमत्कारिक उपचार का वादा करने जैसे आरोप शामिल थे। बाराबंकी जिले के तीन मामलों में शिकायतकर्ता कथित रूप से एक ही व्यक्ति था, जबकि कुछ शिकायतकर्ता बजरंग दल अथवा विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों से जुड़े बताए गए, न कि ऐसे व्यक्ति जिन्होंने स्वयं अपने विधि विरुद्ध धर्मांतरण की शिकायत की हो।
आरोपी व्यक्तियों के जमानत मिलने से पहले कई सप्ताह अथवा महीनों तक जेल में रहने पर भी चिंता व्यक्त की गई। गर्भवती महिलाओं से जुड़े दो मामलों का विशेष रूप से उल्लेख किया गया, जिनमें एक महिला का कथित रूप से हिरासत के दौरान गर्भपात हो गया। कुछ मामलों में मारपीट, धमकी तथा हिरासत में दुर्व्यवहार के आरोपों पर भी चर्चा हुई।
शांतिपूर्ण प्रार्थना सभाओं का अपराधीकरण नहीं होना चाहिए
वक्ताओं ने कहा कि कुछ मामलों में अधिनियम का क्रियान्वयन बल, धोखाधड़ी अथवा दबाव के माध्यम से धर्मांतरण रोकने के उसके घोषित उद्देश्य से आगे बढ़ता दिखाई देता है। उन्होंने जोर दिया कि शांतिपूर्ण धार्मिक सभाएं, प्रार्थना तथा धार्मिक आस्था की अभिव्यक्ति अपने आप में आपराधिक कार्रवाई का आधार नहीं बननी चाहिए।
सम्मेलन में कहा गया कि संविधान का अनुच्छेद 25 अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार प्रदान करता है, जो संवैधानिक सीमाओं के अधीन है। अनुच्छेद 14 के तहत कानून के समक्ष समानता, अनुच्छेद 21 के तहत जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा, विधिसम्मत प्रक्रिया तथा मनमानी गिरफ्तारी और हिरासत में हिंसा से संरक्षण से जुड़े सवाल भी उठाए गए।
वक्ताओं ने चेतावनी दी कि गिरफ्तारी, लंबे समय तक चलने वाली आपराधिक कार्यवाही तथा प्रार्थना सभाओं में हस्तक्षेप से धार्मिक स्वतंत्रता के प्रयोग पर भय का वातावरण पैदा हो सकता है। कुछ पादरियों और ईसाई धर्मावलंबियों ने कथित रूप से गिरफ्तारी और मुकदमे के बाद प्रार्थना सभाएं आयोजित करना बंद कर दिया अथवा अपनी धार्मिक गतिविधियों को काफी सीमित कर दिया।
सरकार से मांगें
सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) ने उत्तर प्रदेश सरकार से अधिनियम के क्रियान्वयन की तत्काल समीक्षा करने की मांग की। पार्टी ने कहा कि आपराधिक कार्यवाही केवल उन्हीं मामलों में शुरू की जानी चाहिए जहां बल, दबाव, धोखाधड़ी अथवा कानून द्वारा प्रतिबंधित किसी अन्य कृत्य के विश्वसनीय प्रमाण मौजूद हों। केवल किसी धार्मिक सभा की प्रकृति पर आपत्ति के आधार पर पुलिस को शांतिपूर्ण प्रार्थना सभाओं में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, जब तक कि किसी संज्ञेय अपराध के घटित होने का उचित संदेह न हो।
सम्मेलन ने हिरासत में हिंसा तथा पुलिस दुर्व्यवहार के आरोपों की स्वतंत्र जांच, गैरकानूनी गिरफ्तारी या हिरासत पाए जाने पर जवाबदेही और मुआवजे तथा शांतिपूर्ण धार्मिक आचरण और विधि विरुद्ध धर्मांतरण के बीच स्पष्ट अंतर सुनिश्चित करने के लिए पुलिस को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने की भी मांग की।
न्यायपालिका से ऐसे मामलों का शीघ्र निस्तारण सुनिश्चित करने तथा अभियोजन के साक्ष्य आधार की गहन समीक्षा करने का आग्रह किया गया, विशेष रूप से उन मामलों में जो कथित पीड़ित के बजाय किसी तीसरे पक्ष की शिकायत पर दर्ज किए गए हों।
सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) ने अधिनियम को निरस्त करने की मांग की
सम्मेलन में सामने आई प्रवृत्तियों तथा संवैधानिक एवं मानवाधिकार संबंधी चिंताओं को देखते हुए सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) ने उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 तथा इसके 2024 के संशोधन को निरस्त करने की मांग की।
पार्टी ने कहा कि अंतःकरण की स्वतंत्रता और धार्मिक आचरण का अधिकार मौलिक संवैधानिक गारंटी है। सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) ने लोकतांत्रिक संगठनों, मानवाधिकार समूहों, अधिवक्ताओं, शिक्षाविदों, पत्रकारों तथा जागरूक नागरिकों से आह्वान किया कि वे धार्मिक पहचान से परे सभी नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा के लिए आगे आएं।
संदीप पांडेय
महासचिव, सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया)
फोन: 0522-2355978, 3564437
ईमेल: ashaashram@yahoo.com


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