पर्यावरण के लिए विनाशकारी इस परियोजना को वापस लिया जाए और अरुणाचल प्रदेश को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किया जाए।
हाल के सप्ताहों में अरुणाचल प्रदेश की जनता ने सियांग नदी पर प्रस्तावित 11,200 मेगावाट क्षमता वाले जलविद्युत बांध के निर्माण के विरुद्ध व्यापक विरोध प्रदर्शन किए हैं। इस बांध का निर्माण सरकारी जलविद्युत कंपनी नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन (एनएचपीसी) द्वारा सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट (SUMP) के तहत किया जाना है। पूर्वी सियांग जिले के पासीघाट शहर, राज्य की राजधानी ईटानगर और दिल्ली स्थित अरुणाचल भवन में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए हैं। 23 और 24 अक्टूबर को अरुणाचल प्रदेश में प्रदर्शनकारियों ने सरकार की उदासीनता और पुलिस दमन के विरोध में दो विधायकों तथा भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के घरों और पासीघाट स्थित एनएचपीसी के कार्यालय में तोड़फोड़ की। उन्होंने कई सरकारी और पुलिस वाहनों को भी आग के हवाले कर दिया।
पुलिस ने बर्बर लाठीचार्ज किया, जिसमें 67 लोग घायल हुए। घायलों में एक बुजुर्ग महिला भी शामिल थीं, जिनकी एक पसली टूट गई। कम से कम 26 लोगों को गिरफ्तार किया गया है और कई अन्य लोगों को हिरासत में लिया गया है। 31 अक्टूबर को पुलिस ने दिल्ली स्थित अरुणाचल भवन के सामने प्रदर्शन कर रहे कई लोगों को भी हिरासत में लिया। अरुणाचल प्रदेश में गिरफ्तार किए गए लोगों में प्रमुख मानवाधिकार अधिवक्ता और पर्यावरण कार्यकर्ता एबो मिली तथा युवा नेता एवं कार्यकर्ता अदुम तायोम, ओकुट पालोह, ओसोन पारोन, ओमाक पारोन, ताजोंग तालोम और ओतुल जेरांग शामिल हैं। अरुणाचल प्रदेश की प्रख्यात पत्रकार टोंगम रीना को प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग करने के कारण पुलिस उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। सियांग घाटी क्षेत्र में आम लोगों की आवाजाही की स्वतंत्रता पर गंभीर प्रतिबंध लगा दिए गए हैं और बड़ी संख्या में सैन्य तथा अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गई है।
इन विरोध प्रदर्शनों के बावजूद सरकार बांध निर्माण की जमीन तैयार करने में सक्रिय रूप से जुटी हुई है। भूमि का प्रारंभिक सर्वेक्षण जारी है। ऐसा प्रतीत होता है कि स्थानीय लोगों को सहमति देने के लिए आर्थिक प्रलोभन देने के उद्देश्य से एनएचपीसी ने स्थानीय बुनियादी ढांचे और आजीविका के अवसरों को बढ़ावा देने के नाम पर कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) के तहत 350 करोड़ रुपये के ‘विकास पैकेज’ का प्रस्ताव रखा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि अंततः उनकी जमीनें ही पानी में डूब जाएंगी, तो इस तरह के विकास का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। खबरों के अनुसार, सियांग के जिला मजिस्ट्रेट ने इन सीएसआर निधियों का इस्तेमाल दो महिंद्रा बोलेरो वाहन खरीदने के लिए किया है और एक ‘गुप्त कोष’ के नाम पर 20 लाख रुपये भी लिए हैं।
यह भी आरोप लगाया गया है कि एनएचपीसी द्वारा प्रस्तुत सहमति प्रपत्र भ्रामक हैं, क्योंकि उन पर ऐसे लोगों के हस्ताक्षर लिए गए हैं जो परियोजना से सीधे तौर पर प्रभावित नहीं होंगे। इसके अतिरिक्त, परिवार के किसी एक सदस्य द्वारा दी गई सहमति को पूरे परिवार की सहमति मान लिया गया है, जबकि कई मामलों में परिवार के अन्य सदस्य इसके पक्ष में नहीं हैं। जमीनी स्तर पर कार्यरत कार्यकर्ताओं और सामुदायिक नेताओं का दावा है कि परियोजना से प्रभावित लगभग 80 प्रतिशत लोग बांध के विरोध में हैं। परियोजना का महिमामंडन करने और प्रदर्शनकारियों को बदनाम करने के उद्देश्य से ऑनलाइन जनसंपर्क अभियान चलाने के लिए निगम ने मुंबई स्थित एक निजी पीआर एजेंसी को 10 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया है, ताकि व्यापक आबादी के बीच परियोजना के पक्ष में समर्थन का माहौल तैयार किया जा सके।
कई स्वतंत्र तथ्य-जांच रिपोर्टों के अनुसार, यह बांध सियांग घाटी क्षेत्र के लोगों की जमीन, आजीविका, संस्कृति और जीवनशैली के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है। यदि इसका निर्माण आगे बढ़ता है, तो सियांग और अपर सियांग जिलों के 27 गांव पूरी तरह जलमग्न हो जाएंगे और दर्जनों अन्य गांव भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होंगे। एसयूएमपी के कारण कुल 1.5 लाख लोगों के विस्थापित होने की आशंका है, जो अरुणाचल प्रदेश की कुल आबादी का लगभग 11 प्रतिशत है।
इस परियोजना से प्रभावित होने वाले लोगों में भारी बहुमत ‘आदि’ जनजाति का है। आदि समुदाय के लिए सियांग घाटी केवल उनकी मातृभूमि और आजीविका का स्रोत ही नहीं है, बल्कि इसका अत्यंत गहरा ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी है। यह समुदाय हजारों वर्षों से इस भूमि पर निवास करता आया है और सियांग नदी के सहारे उसका जीवन और अस्तित्व कायम रहा है। वे इस नदी को अपनी ‘आने’ अर्थात माता के रूप में पूजते हैं।
इस परियोजना की पर्यावरणीय कीमत अत्यंत भारी होने की आशंका है। हिमालयी क्षेत्र पहले से ही पारिस्थितिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील है और नेपाल में हाल ही में आई विनाशकारी बाढ़ इस बात की पुष्टि करती है कि यह क्षेत्र जलवायु परिवर्तन से सामान्य से अधिक प्रभावित है। पिछले कुछ दशकों में दुनिया भर के विशेषज्ञों ने बड़े बांधों के प्रतिकूल पर्यावरणीय प्रभावों की आलोचना की है और इनके स्थान पर कई व्यवहार्य छोटे पैमाने के विकल्प प्रस्तावित किए हैं।
पिछले कुछ महीनों से सरकार एसयूएमपी को चीन द्वारा नदी के ऊपरी हिस्से में बनाए जा रहे 60,000 मेगावाट के बांध का मुकाबला करने के लिए आवश्यक परियोजना के रूप में पेश कर रही है। सरकार का दावा है कि यदि भारत के पास नदी के निचले हिस्से में जलप्रवाह को नियंत्रित करने की क्षमता नहीं होगी, तो चीन की सरकार द्वारा ऊपरी हिस्से में पानी छोड़ने या उसका प्रवाह मोड़ने के आधार पर भारत बाढ़ और सूखे के खतरे में रहेगा। सरकार का तर्क है कि चीन के बांध के जलाशय की क्षमता 5.5 अरब घन मीटर होगी, जबकि भारत का प्रस्तावित जलाशय 9.2 अरब घन मीटर पानी संग्रहित कर सकेगा। इसलिए यह बांध भारत को चीन द्वारा छोड़े जाने वाले अतिरिक्त पानी को सुरक्षित रूप से रोकने में सक्षम बनाएगा। हालांकि, यह तर्क कम से कम दो कारणों से संदेहास्पद प्रतीत होता है।
पहला, एसयूएमपी कोई हाल ही में परिकल्पित परियोजना नहीं है, बल्कि इसका प्रस्ताव पहली बार 2008-09 में रखा गया था, जब चीन के बांध की कोई चर्चा नहीं थी। एनएचपीसी ने 2017 में इसके प्रारंभिक सर्वेक्षण शुरू किए थे। इसी दौरान परियोजना से जुड़ी जानकारियां क्षेत्र के आम लोगों तक पहुंचीं। इसके परिणामस्वरूप विरोध प्रदर्शन शुरू हुए, जिन्होंने प्रारंभिक प्रक्रिया को बाधित किया और अंततः परियोजना को ठप कर दिया। चीन के निर्माणाधीन बांध और उससे जुड़े कथित राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी खतरों की हालिया खबरों ने अधिकारियों को इस परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए एक नया बहाना दे दिया है।
दूसरा, यदि चीन अपने बांध का इस्तेमाल युद्ध के हथियार के रूप में करने का फैसला करता है, तो यह संभावना बेहद कम है कि भारत का बांध उसे रोक पाएगा। भले ही भारत के प्रस्तावित जलाशय की क्षमता अधिक हो, लेकिन यह सुनिश्चित करना असंभव-सा प्रतीत होता है कि चीन द्वारा जल-आधारित हमला किए जाने के ठीक उसी समय भारतीय जलाशय में पर्याप्त खाली क्षमता उपलब्ध होगी। क्या होगा यदि चीन द्वारा 5.5 अरब घन मीटर पानी छोड़े जाने के समय भारतीय जलाशय पहले से ही भरा हुआ हो, उदाहरण के लिए मानसून के दौरान भारी बारिश के कारण?
इससे कहीं अधिक विवेकपूर्ण रास्ता चीन के साथ सकारात्मक कूटनीतिक संबंध विकसित करना और उसके बांध के निर्माण में पारदर्शिता तथा सहयोग की मांग करना होगा। चूंकि नदी के निचले हिस्से का क्षेत्र भारत के अधिकार क्षेत्र में आता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत भारत चीन के बांध के संबंध में व्यापक जानकारी मांगने का हकदार है। विशेषज्ञों ने प्रस्ताव दिया है कि दोनों देश संयुक्त प्रभाव आकलन करें, ताकि दोनों पक्ष इसके संभावित परिणामों को पूरी तरह समझ सकें और पर्याप्त सावधानी तथा आपसी समझ के साथ आगे बढ़ सकें।
उपरोक्त तथ्यों को देखते हुए सियांग बांध का निर्माण आगे बढ़ाना पूरी तरह अनुचित है। सरकार का इस परियोजना को लागू करने पर अड़े रहना उसके छिपे हुए उद्देश्यों को उजागर करता है। ये उद्देश्य अंततः भूमि पर राज्य और कॉरपोरेट नियंत्रण स्थापित करने तथा सत्ता और संपत्ति को कुछ मुट्ठीभर लोगों के हाथों में केंद्रित करने से जुड़े हैं। यह वर्तमान सरकार की उस नीति का एक और उदाहरण है, जिसके तहत देश के पहले से ही हाशिये पर स्थित लोगों को और अधिक हाशिये पर धकेला जा रहा है।
एसपी(आई) मांग करती है कि गिरफ्तार और हिरासत में लिए गए सभी प्रदर्शनकारियों को तत्काल रिहा किया जाए तथा उनके खिलाफ दर्ज सभी FIR वापस ली जाएं। हम मांग करते हैं कि राज्य के भीतर आम लोगों की आवाजाही और मीडिया के कामकाज पर लगाए गए सभी प्रतिबंध तत्काल हटाए जाएं। आम लोगों की आवाजों को दबाने के लिए तैनात किए गए सभी सैन्य बलों को वापस बुलाया जाए।
एसपी(आई) आदि समुदाय के लोगों के साथ अपनी एकजुटता व्यक्त करती है और उनके विरुद्ध की जा रही हिंसक दमनकारी कार्रवाइयों की कड़ी निंदा करती है। सरकार स्थानीय आबादी की असहमति के बावजूद उस पर इतने बड़े पैमाने की विकास परियोजना थोप नहीं सकती। हम एक लोकतांत्रिक राष्ट्र हैं, जहां प्रत्येक व्यक्ति, विशेषकर हमारे मूलनिवासी समुदायों को अपने क्षेत्र की विकास परियोजनाओं से संबंधित निर्णय लेने की प्रक्रिया में भागीदारी का अधिकार है। अरुणाचल प्रदेश के पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के लिए वर्तमान सरकार द्वारा उत्पन्न किए जा रहे गंभीर खतरे को देखते हुए, राज्य को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की लंबे समय से चली आ रही मांग को लागू किया जाना चाहिए।
मीर शाहिद सलीम (Ph: 9622002001)
उपाध्यक्ष एवं प्रवक्ता
सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया)


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