मुंशी प्रेमचंद – सुदामा पाण्डेय धूमिल – राजनारायण – नरेन्द्र देव पदयात्रा

चाहे अमीर की हो या गरीब की संतान, सबकी शिक्षा हो समान

13 से 15 जुलाई, 2026

मुंशी प्रेमचंद के गांव लमही से सुदामा पाण्डेय के गांव खेवली से राजनारायण के गांव गंजारी होते हुए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय जहां आचार्य नरेन्द्र देव कुलपति रहे तक

इस देश में कई किस्म की पारम्परिक गैर-बारबरियां हैं जैसे जाति, धर्म, लिंग, वर्ग, आदि के नाम पर। हमारे संविधान की प्रस्तावना में हरेक नागरिक को प्रतिष्ठा और अवसर की समानता प्राप्त करने का आश्वासन दिया गया है। मौलिक अधिकार अनुच्छेद 15 में कहा गया है कि राज्य धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान इनमें से किसी के आधार पर भेद नहीं करेगा। किंतु हकीकत यह है कि उपर्युक्त किसी भी आधार पर हम बारबरी वाला समाज बनाने से कोसों दूर हैं। आज भी इन्हीं आधारों पर भेदभाव व हिंसा की घटनाएं होती रहती हैं। इनमें से कुछ घटनाओं के लिए राज्य खुद जिम्मेदार होता है।

शिक्षा एक माध्यम है जो कुछ हद तक इन गैर बराबरियों को कम करती है। शिक्षा से ही उम्मीद है कि हम अंततः एक बराबरी वाला समाज बना पाएंगे जो हरेक प्रगतिशील सामाजिक बदलाव चाहने वाले का आदर्श है। किंतु हमने शिक्षा व्यवस्था ही ऐसी अपनाई है कि शिक्षा के माध्यम से हम भेदभाव कि एक नई श्रेणी खड़ी कर देते हैं। आम तौर पर मजबूत सामाजिक-आर्थिक वर्ग के बच्चे अच्छी आय वाले रोजगार के अवसरों तक पहुंच बना लेते है और कमजोर तबकों के बच्चे कम आय वाले रोजगार के अवसरों तक ही सीमित रह जाते हैं या बेरोजगार रह जाते हैं। अपवाद जरूर होते हैं लेकिन कम।

भारत में 1968 में ही समान शिक्षा प्रणाली की संस्तुति कोठारी आयोग ने की। लेकिन आज तक किसी सरकार ने उसे नहीं माना। क्यों? दुनिया के जिन देशों ने भी 99-100 प्रतिशत शिक्षा की दरें हासिल की हैं उनके यहां समान शिक्षा प्रणाली लागू है चाहे वे अमरीका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी देश विकसित देश हों या दक्षिण पूर्व एशिया व मध्य एशिया के देश हों, अथवा ईरान या श्रीलंका। सवाल यह है भारत एक लोकतंत्र होते हुए भी समान शिक्षा प्रणाली क्यों नहीं लागू करता है? वर्तमान सरकार को एक देश एक सबकुछ करने का बहुत शौक है लेकिन उसने आज तक एक देश एक शिक्षा की बात क्यों नहीं की? हकीकत यह है कि सभी सरकारें सम्भ्रांत वर्ग की पोषक हैं और नहीं चाहतीं कि उनके बच्चों के साथ गरीब किसान-मजदूर का बच्चा उच्च शिक्षा व नौकरियों के अवसरों हेतु प्रतिस्पर्धा में खड़ा हो।

मुंशी प्रेमचंद, सुदामा पाण्डेय धूमिल, राजनारायण व आचार्य नरेन्द्र देव से प्रेरणा लेकर जिन्होंने हमेशा समाज के कमजोर तबकों के अधिकारों की वकालत की हम इस यात्रा के माध्यम से उत्तर प्रदेश में 2015 के उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल के फैसले कि सरकारी तनख्वाह पाने वालों के बच्चे अनिवार्य रूप से सरकारी विद्यालय में ही पढ़ें को लागू कराने की मांग उठाना चाहते हैं। यदि ऐसा हो पाया तभी गरीब के बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध हो पाएगी और वह अपने परिवार की गरीबी का दुष्चक्र तोड़ पाने की स्थिति में आएगा।

हम जंतर-मंतर दिल्ली में चल रहे काकरोच जनता पार्टी के धरने का भी समर्थन करते हैं और शिक्षा मंत्री धमेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हैं।

नंदलाल9415300520,

धनंजय त्रिपाठी, 7376848410,

साझा संस्कृति मंच, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय

संदीप पाण्डेय, 0522 2355978, 3564437,

सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया), ग्रीन पार्टी


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