दक्षिण एशिया क्षेत्र के विकास के लिए भारत व पाकिस्तान के सौहार्दपूर्ण संबंध आवश्यक

भारत की अवधारणा हमारे स्वतंत्रता आंदोलन में निहित है तथा संविधान की प्रस्तावना में समाहित है। यह लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद और उदारवाद का ऐसा समन्वय है जिसका उद्देश्य देश की जनता के लिए आर्थिक न्याय सुनिश्चित करना है। देश को लोकतांत्रिक एवं उदार मूल्यों को बनाए रखते हुए अपनी जनता को आर्थिक न्याय प्रदान करने में सक्षम होना चाहिए।

वर्ष 1970 में भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) 62.4 अरब अमेरिकी डॉलर तथा प्रति व्यक्ति आय 114 अमेरिकी डॉलर थी। वर्ष 2026 तक यह बढ़कर क्रमशः 4.15 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तथा 2813 अमेरिकी डॉलर हो गई। पहली दृष्टि में वर्ष 1970 से 2026 के बीच प्रति व्यक्ति आय में यह वृद्धि काफी महत्वपूर्ण प्रतीत होती है, किंतु मुद्रास्फीति-समायोजित क्रय शक्ति (पर्चेसिंग पावर) के आधार पर देखें तो यह लगभग 1.6 लाख रुपये से बढ़कर केवल 2.35 लाख रुपये हुई है। गरीबी से आबादी को बाहर निकालने के लिए प्रति व्यक्ति आय में यह वृद्धि पर्याप्त नहीं कही जा सकती। संपत्ति सृजन का लाभ गरीब आबादी तक नहीं पहुँच पाया है और इसका बड़ा हिस्सा संपन्न वर्ग के पास केंद्रित हो गया है। इसका प्रतिबिंब हमारे देश के जिनी गुणांक में दिखाई देता है, जो 62 है। (इस सूचकांक में 0 का अर्थ पूर्ण समानता तथा 100 का अर्थ अधिकतम असमानता होता है।) भारत एक अत्यधिक असमान समाज के रूप में विकसित हुआ है और अपने सामान्य नागरिकों को आर्थिक न्याय प्रदान करने में सफल नहीं हो पाया है।

चार दशकों के दौरान इन देशों के आर्थिक विकास को समझने के लिए चीन, दक्षिण कोरिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश और भारत की व्यापक आर्थिक (मैक्रो-इकोनॉमिक) स्थिति की तुलना करना आवश्यक है।

क्र. सं. देश का नाम जीडीपी (1970) जीडीपी (2026) प्रति व्यक्ति आय (1970) प्रति व्यक्ति आय (2026)

1. भारत 62.4 अरब डॉलर 4.15 ट्रिलियन डॉलर 114 डॉलर 2813 डॉलर

2. पाकिस्तान (1970 में अविभाजित आँकड़े) 10.03 अरब डॉलर 452 अरब डॉलर 167 डॉलर 1901 डॉलर

3. बांग्लादेश लागू नहीं 510 अरब डॉलर लागू नहीं 2960 डॉलर

4. दक्षिण कोरिया 8.3 अरब डॉलर 1.93 ट्रिलियन डॉलर 253 डॉलर 37,142 डॉलर

5. चीन 92.7 अरब डॉलर 20.85 ट्रिलियन डॉलर 113 डॉलर 14,874 डॉलर

वर्ष 1970 में चीन की अर्थव्यवस्था का आकार और प्रति व्यक्ति आय भारत के लगभग समान थे, किंतु चीन ने एक गरीब देश से मध्यम आय वाले देश तक की उल्लेखनीय छलांग लगाई। इसी प्रकार, दक्षिण कोरिया, जो 1970 में एक गरीब देश था, आज उच्च आय वाला राष्ट्र बन चुका है। इसके विपरीत, दक्षिण एशिया के देश-भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश तथा अन्य सार्क राष्ट्र-अपेक्षित आर्थिक प्रगति नहीं कर सके और अपेक्षाकृत गरीब ही बने रहे। इसलिए सार्क देशों के नेतृत्व को वर्ष 2050 तक आर्थिक समृद्धि प्राप्त करने का एक साझा लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए, ताकि क्षेत्र की आबादी को गरीबी से बाहर निकाला जा सके।

किसी देश अथवा क्षेत्र के तीव्र आर्थिक विकास के लिए कुछ प्रमुख तत्व आवश्यक होते हैं-स्थिर एवं पूर्वानुमेय राजकोषीय नीतियाँ, विधि का शासन तथा सबसे महत्वपूर्ण, देश और पूरे क्षेत्र में शांति। चीन के साथ युद्ध में मिली पराजय के बाद भारत का ध्यान बाहरी सुरक्षा चुनौतियों की ओर केंद्रित हो गया और उसने अपने सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण पर विशेष बल दिया। इसी प्रकार, मुख्यतः भारत और पाकिस्तान के बीच बिगड़ते संबंधों के कारण सार्क क्षेत्र एक सशक्त आर्थिक संघ के रूप में विकसित नहीं हो सका। सार्क आर्थिक सहयोग के मंच के बजाय राजनीतिक मतभेदों और आरोप-प्रत्यारोप का मंच बन गया। वस्तुओं और सेवाओं के मुक्त आवागमन के स्थान पर सदस्य देशों के बीच राजनीतिक विवाद हावी रहे। यह विडंबना ही है कि लगभग 1.9 अरब (विश्व की लगभग 24 प्रतिशत) आबादी वाला सार्क क्षेत्र, लगभग 3000 अमेरिकी डॉलर की औसत प्रति व्यक्ति आय के साथ, विश्व के सबसे गरीब क्षेत्रों में से एक है।

सार्क को अपने उद्देश्यों में आर्थिक सहयोग को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए ताकि क्षेत्र महत्वपूर्ण व्यापक आर्थिक उपलब्धियाँ प्राप्त कर सके, जो गरीबी उन्मूलन के लिए आवश्यक हैं। भारत और पाकिस्तान सार्क के दो प्रमुख देश हैं और उनका सहयोग पूरे क्षेत्र के आर्थिक विकास की आधारशिला बन सकता है।

भारत-पाकिस्तान संवाद एवं सहयोग के पक्ष में तर्क निम्नलिखित हैंः

  1. भारत और पाकिस्तान के बीच अविश्वास तथा शत्रुता के कारण दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग उच्च सीमा शुल्क (टैरिफ) से प्रभावित हुआ है। इससे दोनों देशों में व्यापार करने की लागत बढ़ी है और व्यावसायिक प्रतिस्पर्धात्मकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। दोनों देश वस्तुओं और सेवाओं के निर्बाध प्रवाह की अनुमति नहीं देते, जिसके कारण उन्हें तीसरे देशों से अधिक लागत पर आयात करना पड़ता है। साथ ही, दोनों देशों ने रक्षा व्यय में उल्लेखनीय वृद्धि की है, जबकि उनकी प्राथमिकता मानव संसाधन विकास, विशेषकर बुनियादी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर होनी चाहिए।
  2. भारत और पाकिस्तान समान प्रकार की अनेक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इसलिए दोनों देशों के वैज्ञानिक, चिकित्सक और अभियंता अपने अनुभव साझा कर जलवायु परिवर्तन, बाढ़, मृदा अपरदन, कृषि- वनीकरण, संक्रामक रोगों तथा अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के व्यावहारिक समाधान खोज सकते हैं। वर्तमान में हम वैज्ञानिक और अभियांत्रिकीय समाधान प्रायः आर्थिक सहयोग एवं विकास नामक 38 विकसित देशों के संगठन (ओ.ई.सी.डी.) से अपनाने का प्रयास करते हैं, जो स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप हमेशा उपयुक्त या व्यवहार्य नहीं होते।
  3. भारत और पाकिस्तान के बीच सदियों पुराने ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संबंध हैं। इसलिए दोनों देशों के लिए सांस्कृतिक संबंधों को समाप्त करना, एक-दूसरे के कलाकारों को संयुक्त सृजन एवं सहयोग में कार्य करने से रोकना तथा उनकी कलाकृतियों के सीमा पार प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाना निरर्थक है। विडंबना यह है कि जब कानूनी आदान-प्रदान की अनुमति नहीं होती, तब फिल्में और अन्य कलाकृतियाँ अवैध रूप से दूसरे देश में पहुँचती हैं। दोनों देशों के कलाकार नागरिक समाजों को एक-दूसरे के निकट ला सकते हैं और लोगों को यह समझने में सहायता कर सकते हैं कि घृणा से दोनों देशों की जटिल समस्याओं का समाधान संभव नहीं है।
  4. भारत एक विशाल देश है और अपनी मानवीय दृष्टिकोण के माध्यम से क्षेत्र के अन्य देशों को सकारात्मक रूप से प्रभावित करने की पर्याप्त क्षमता रखता है। यह प्रभाव संरक्षणवादी दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि सहयोग और मित्रता की भावना से होना चाहिए। भारत पाकिस्तान के आम नागरिकों को कैंसर, हृदय रोग तथा अन्य गंभीर बीमारियों के उपचार के लिए वीजा सुविधा प्रदान कर सकता है। पाकिस्तान का संपन्न वर्ग पश्चिमी देशों में उपचार करा सकता है, लेकिन आम जनता को गंभीर बीमारियों के लिए किफायती स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता होती है। इससे सहयोग और परोपकार की भावना विकसित होगी, जो दीर्घकाल में तनाव कम करने तथा दोनों देशों के नागरिक समाजों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने में सहायक होगी।
  5. भारत-पाकिस्तान संबंधों और जर्मनी-फ्रांस संबंधों के बीच कुछ समानताएँ देखी जा सकती हैं। द्वितीय विश्व युद्ध से पहले जर्मनी और फ्रांस में उग्र राष्ट्रवाद का प्रभाव था, जिसके कारण दोनों देशों के बीच अनेक युद्ध हुए और क्षेत्र का आर्थिक विकास बाधित हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दोनों देशों ने अनियंत्रित राष्ट्रवाद की निरर्थकता को समझा, आपसी सहयोग का मार्ग अपनाया और अनेक संधियाँ कीं, जिनसे क्षेत्रीय आर्थिक विकास, छात्र विनिमय कार्यक्रमों तथा नागरिक समाज के बीच सहभागिता को बढ़ावा मिला। आज दोनों देशों के बीच खुली सीमाएँ हैं, जिसने आगे चलकर यूरो क्षेत्र (यूरोजोन) के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। इससे पूरे क्षेत्र में समृद्धि आई और आज यह कल्पना करना भी कठिन है कि फ्रांस और जर्मनी फिर कभी युद्ध करेंगे, क्योंकि उनकी नियति एक-दूसरे से जुड़ चुकी है। भारत और पाकिस्तान भी अपने अतीत के कट्टर प्रतिद्वंद्वियों के सहयोग और संवाद से सीख लेकर अपने राजनीतिक मतभेदों का स्थायी समाधान खोज सकते हैं, जिससे पूरे क्षेत्र की साझा समृद्धि सुनिश्चित हो सके, जो लंबे समय से शत्रुता और अविश्वास के कारण बाधित रही है। दोनों देशों के नेतृत्व को परिपक्वता का परिचय देते हुए क्षेत्र में आर्थिक समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए।

निष्कर्ष: दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) एक सशक्त क्षेत्रीय आर्थिक समूह के रूप में दक्षिण एशिया की जनता के आर्थिक उत्थान का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। क्षेत्र के प्रत्येक देश को यह समझना चाहिए कि कोई भी राष्ट्र अपने पड़ोस से अलग-थलग रहकर प्रगति नहीं कर सकता। यदि क्षेत्र का कोई देश असफल होता है, तो उसका प्रतिकूल प्रभाव अन्य देशों पर भी पड़ता है। इसलिए आवश्यक है कि नागरिक समाज अपनी-अपनी सरकारों पर पड़ोसी देशों के साथ संबंध सुधारने के लिए सकारात्मक दबाव बनाए, ताकि पूरे क्षेत्र का समग्र विकास सुनिश्चित हो सके।

लेखकः

रजनीश चंद्र एवं संदीप पांडेय

संपर्कः 8959595019, ashaashram@yahoo.com

लेखक परिचयः रजनीश चंद्र सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हैं तथा संदीप पांडेय सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के प्रधान महासचिव हैं।


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