Image credit: Ivan Lian (https://www.flickr.com/photos/ivanlian/6832429438/); License: https://creativecommons.org/licenses/by-nc-nd/2.0/
10 अक्टूबर को दिल्ली ने ऐसी घटना देखी, जो पिछले एक दशक से इस शासन की एक परिचित कार्यशैली बन चुकी है। असहमति की आवाजों को दबाने, लोगों को अपनी बात कहने से रोकने और उनके विरुद्ध बर्बर हिंसा करने के लिए पुलिस और अर्धसैनिक बलों का इस्तेमाल किया गया। इस हिंसा में पुरुषों, महिलाओं और बच्चों तक को नहीं बख्शा गया। अधिवक्ताओं को भी बर्बरता का सामना करना पड़ रहा है। शादान फरासत जैसे व्यक्ति के साथ पुलिस द्वारा धक्का-मुक्की और दुर्व्यवहार होते देखना न केवल विचलित करने वाला, बल्कि क्रूर भी है। गुंडे बिना किसी भय या पश्चाताप के सड़कों पर बच्चों और महिलाओं को पीट रहे हैं, वह भी दिल्ली पुलिस के ठीक सामने। जब किसी सरकार को यह समझ नहीं आता कि असहमति जताने वालों से संवैधानिक रूप से वैध तरीके से कैसे निपटा जाए और उसे केवल पाशविक बल तथा दक्षिणपंथी गुंडों का सहारा लेना पड़ता है, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि उसने शासन चलाने के वैधानिक तरीकों पर अपना नियंत्रण खो दिया है और वह प्रशासनिक पक्षाघात की स्थिति में पहुँच गई है। दिल्ली पुलिस केवल आदेशों का पालन ही नहीं कर रही है, बल्कि हिंसा की ऐसी घटनाओं में उसकी मिलीभगत भी है। इस दिन वर्दीधारी और बिना वर्दी वाले गुंडों के बीच का अंतर मिट गया।
फिर, अलग क्या है?
काॅकरोच जनता पार्टी आंदोलन ने सरकार की कायरता, उसकी खामियों और असहमति के प्रति उसके भय को उजागर किया है। अब यह भय विक्षिप्त आशंका और गहरे संदेह में बदल चुका है। संविधान के अनुच्छेद 22 में जिस निवारक निरोध का प्रावधान है, उसे उस तरीके से लागू नहीं किया जा सकता, जैसा हमने इस दिन देखा। हजारों लोगों को हिरासत में लिया गया था।
निवारक निरोध का आदेश देने के लिए मूलभूत कसौटी यह है कि ऐसे पर्याप्त आधार मौजूद हों, जिनसे यह विश्वास करने का कारण हो कि संबंधित व्यक्ति राज्य की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था आदि के लिए खतरा उत्पन्न कर सकता है। निवारक निरोध के आधार संबंधित व्यक्ति को बताए जाने चाहिए। उस व्यक्ति को हिरासत के विरुद्ध अपना पक्ष रखने और अभ्यावेदन प्रस्तुत करने का अधिकार भी है।
लेकिन इस दिन हमने देखा कि लोगों को अमानवीय तरीके से घसीटकर ले जाया गया। यह मानना भी अत्यधिक आशावादी होगा कि उन्हें उनकी हिरासत के कारण बताए गए होंगे। और कम-से-कम इतना तो कहा ही जा सकता है कि यह मानना बेतुका होगा कि उन्हें अपनी हिरासत के विरुद्ध अभ्यावेदन देने की अनुमति दी गई होगी।
दिल्ली में बड़े पैमाने पर की गई गिरफ्तारियों और विरोध-प्रदर्शनों पर लगाए गए प्रतिबंधों की गंभीर जाँच-पड़ताल आवश्यक है। इन हिरासतों का एकमात्र औचित्य ऐसी सरकार की विक्षिप्त आशंका थी, जो अपने ही लोगों से डरती है। यह ऐसी सरकार है, जो किसी भी प्रकार की असहमति सुनने को तैयार नहीं है।
यह एक त्रासदी है, यही सच्चाई है, और यह आपातकाल से कहीं अधिक गंभीर स्थिति है। यह न्यायिक संहार है, साथ ही, यह अधिनायकवादी विधिवाद का भी एक उदाहरण है। जब कोई सरकार अपने ही लोगों से डरने लगती है, तो वह विभिन्न रूपों में हिंसा पर उतर आती है। वह लोगों को अपने अधीन करने का प्रयास करती है, कठोर और दमनकारी कानूनों के इस्तेमाल से उन्हें डराती है, उन्हें हिरासत में लेती है तथा उनकी आवागमन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पाबंदियाँ लगाती है। वह स्वयं को पीड़ित के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करती है और धर्म के नाम पर तथा लोगों के मन में दूसरों के प्रति परायापन पैदा करके उन्हें एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा कर देती है।
इस त्रासदी का एक और पहलू भी स्पष्ट है, सरकार एक हद तक इसमें सफल रही है। दिल्ली पुलिस हमेशा से सरकार का एक हथियार रही है। चाहे किसानों का संघर्ष रहा हो, नागरिकता संशोधन अधिनियम-राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर विरोधी प्रदर्शन रहे हों या नीट प्रश्नपत्र लीक के विरोध में छात्रों और युवाओं के प्रदर्शन, पुलिस ने ‘आदेशों का पालन’ करने के बहाने बड़े पैमाने पर हिंसा की है। इन घटनाओं के दृश्य हमारी सामूहिक चेतना पर गहरे घाव छोड़ चुके हैं। यह देखकर हृदय विदीर्ण हो जाता है कि यह बर्बरता लगातार बढ़ती जा रही है।
लगातार हिंसा होने का प्रभाव
जनसंचार माध्यमों और सोशल मीडिया पर लगातार दिखाई देने वाली हिंसा की घटनाओं ने समाज को एक हद तक इतना सुन्न या संवेदनहीन बना दिया है कि शायद अब वे घटनाएँ हमारी अंतरात्मा को विचलित भी नहीं करतीं। हालाँकि, इसके लिए समाज को ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अलग-अलग लोग पीड़ा का अनुभव अलग-अलग ढंग से करते हैं और उससे निपटते हैं। कभी-कभी उनकी पीड़ा की तीव्रता में भी बहुत अंतर होता है। फिर भी, जिसकी अंतरात्मा जागृत है, ऐसा कोई भी व्यक्ति इस पीड़ा के अस्तित्व से इनकार नहीं कर सकता।
मतदाता सूची में हेरफेर के विरुद्ध चल रहे आंदोलन में भाग लेने वाले इस देश के युवाओं द्वारा अपनाई गई भाषा शिकायत की भाषा है। यह उस पीड़ा की अभिव्यक्ति भी है, जो इस शासन ने एक दशक से अधिक समय में अनेक विरोध-प्रदर्शनों के दौरान अपने ही लोगों को दी है। चुप रहना और कुछ भी न करना या न कहना शर्मनाक है।
आवागमन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इतनी मूल्यवान हैं कि उन्हें किसी विक्षिप्त आशंकाओं से ग्रस्त सरकार की मर्जी के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इसी सिद्धांत की पुष्टि करने वाले सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का हवाला देना व्यर्थ है। अदालतें इस सिद्धांत से परिचित हैं, फिर भी निष्क्रिय बनी हुई हैं। कुछ न्यायाधीश इस दमन में सहभागी हैं, जबकि संस्थाएँ संवैधानिक मूल्यों के इस संहार के लिए बहाने और आड़ उपलब्ध करा रही हैं।
मित्र-पूँजीवाद
इसके बावजूद, कुछ लोग अपने निहित पूँजीवादी या अन्य स्वार्थों के कारण इस शासन का समर्थन करते रहते हैं। हालाँकि, जैसा कि पहले भी कहा गया है, सरकार ने निर्दोष लोगों को सफलतापूर्वक एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा कर दिया है। वे उस धुएँ के पर्दे के पार देख ही नहीं पाते, जिसे इस सरकार ने खड़ा किया है।
वे बेरोजगार हैं, और यदि रोजगार में हैं, तो भी उनके पास सामाजिक सुरक्षा और श्रम संबंधी अधिकारों का अभाव है। ऐसा इसलिए है क्योंकि जब लोग कोविड के कारण मर रहे थे, तब इन अधिकारों को कमजोर कर दिया गया था! अब केवल यही आशा की जा सकती है कि किसी दिन इस स्थिति की भरपाई या सुधार संभव होगा।
मित्र-पूँजीवाद पर आधारित शासन मॉडल ने ‘अच्छे दिन’ के नाम पर इस देश के मध्यवर्ग को खोखले दिखावे के अलावा कुछ नहीं दिया है। यह व्यवस्था केवल उपभोक्तावाद पर आधारित है, हर चीज एक उत्पाद बन गई है और अमीरों को अति-धनी बनने की छूट मिली हुई है।
इस व्यवस्था को ऐसी सरकार की आवश्यकता है और यह ऐसी सरकार को बनाए भी रखती है, जो विक्षिप्त आशंकाओं से ग्रस्त हो, जो हमारे शहरों को बंद कर दे, लोगों को हिरासत में ले और जब भी इस व्यवस्था की नींव को खतरा महसूस हो असहमति को कुचल दे, चाहे वह असहमति कितनी ही शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक क्यों न हो।
आशा
यह सब निराशाजनक लग सकता है, लेकिन आशा हमेशा लोगों में ही निहित होती है, उन लोगों में जो जीवन की कठिनाइयों के बीच संघर्ष करते हुए भी इन मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध रहते हैं और इन्हें केवल अमूर्त विचार कहकर खारिज करने के बजाय इनके लिए चिंता करते हैं। यह केवल चुनावों में किसी अत्याचारी सरकार को हराने का प्रश्न नहीं है। यह संवैधानिक मूल्यों को सुरक्षित रखने, उन्हें विकसित करने और दुख, अन्याय तथा कानून के असमान प्रयोग के बावजूद उन्हें बनाए रखने का प्रश्न है। आज भी समानता एक दूर का सपना बनी हुई है। जो लोग संविधान की जटिलताओं को नहीं समझते, वे भी एक बात समझते हैं। वे जानते हैं कि देश पर अब एक अहंकारी निरंकुश शासक का शासन है, जिसे आम लोगों के अधिकारों की बहुत कम परवाह है। लोगों ने ब्रिटिश शासन के अत्याचारों को बर्दाश्त नहीं किया था। उन्होंने 1975 से 1977 के दौरान इंदिरा गांधी के शासन की ज्यादतियों को भी स्वीकार नहीं किया था। पिछले कई महीनों में परिस्थितियाँ जिस तेजी से बदली हैं, उसके बाद अब लोग नरेंद्र मोदी का सीधे सामना करने के लिए तैयार हैं। ज्ञानेश कुमार केवल एक चेहरा हैं। यदि ज्ञानेश कुमार चले जाते हैं, तो मोदी सरकार की वैधता भी समाप्त हो जाएगी।
कुछ भी स्थायी नहीं है। फिर भी, यह अनुमान लगाना असंभव है कि अगला चुनाव इस सरकार की हार का कारण बनेगा या चुनाव स्वयं स्वतंत्र और निष्पक्ष होगा भी या नहीं।
जीवन अर्थ की तलाश और उसे गढ़ने की एक सतत प्रक्रिया है। हम उन्हीं चीजों के लिए प्रयास करना चुनते हैं, जिन्हें हम अपने जीवन में अर्थपूर्ण मानते हैं। हमें इस बात पर फिर से जोर देना होगा कि समानता, स्वतंत्रता और गरिमा के संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक मूल्य आज भी अर्थपूर्ण हैं।
यद्यपि यह बात बुनियादी और स्वतः स्पष्ट होनी चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति के साथ एक इंसान की तरह व्यवहार किया जाना चाहिए, फिर भी इस सिद्धांत को बार-बार दोहराने की आवश्यकता है। आशा यही है कि एक दिन यह बात दिल्ली पुलिस, केंद्र सरकार और सबसे महत्त्वपूर्ण, न्यायपालिका के उन बहरे कानों तक भी पहुँचेगी, जो अभी इसे सुनने के लिए तैयार नहीं हैं।
लेखकः आयुष बाजपेयी और संदीप पांडेय
संपर्क नंबरः 7222918155, 0522 2355978, 3564437
लेखकों के बारे मेंः आयुष बाजपेयी मुंबई में कार्यरत एक वकील हैं और उन्होंने हैदराबाद स्थित नालसार विधि विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की है। नालसार में अपने अध्ययन के दौरान वे संवैधानिकता पर आयोजित व्याख्यान-श्रृंखला के आयोजकों में शामिल थे। संदीप पांडेय सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के प्रधान महासचिव हैं।


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