सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) की मांग: कश्मीरी मानवाधिकार कार्यकर्ता खुर्रम परवेज़ को रिहा किया जाए

सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा कश्मीरी मानवाधिकार कार्यकर्ता खुर्रम परवेज़ को उन दो मामलों में से एक में जमानत दिए जाने के निर्णय का स्वागत करती है, जिनके संबंध में वे कारावास में हैं। पार्टी को आशा है कि उन्हें दूसरे मामले में भी जमानत मिलेगी, ताकि निराधार आरोपों पर चार वर्ष से अधिक समय जेल में बिताने के बाद वे अंततः अपने घर लौट सकें।

परवेज़ जम्मू कश्मीर कोएलिशन ऑफ सिविल सोसाइटी (JKCCS) के सह-संस्थापक हैं, जो कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघनों का दस्तावेजीकरण करने वाला एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त संगठन है। JKCCS ने कश्मीरी में अवैध हिरासतों, जबरन गुमशुदगियों, यातना तथा यौन हिंसा की घटनाओं पर गहन जांच-पड़ताल की है और ऐसे प्रामाणिक प्रतिवेदन तैयार किए हैं जिनका हवाला अंतरराष्ट्रीय विद्वानों तथा नागरिक समाज संगठनों द्वारा दिया गया है। JKCCS को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद द्वारा आयोजित भारत की मानवाधिकार स्थिति संबंधी समीक्षा सत्रों में भाग लेने के लिए भी आमंत्रित किया गया है। परवेज़ की गिरफ्तारी स्पष्ट रूप से सरकार की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर में उसकी नीतियों और कार्रवाइयों की किसी भी प्रकार की असहमति या आलोचना को व्यवस्थित रूप से दबाया जा रहा है।

खुर्रम को मई 2022 में यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधियाँ (निवारण) अधिनियम) के तहत “भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध छेड़ने की साज़िश”, “किसी आतंकवादी कृत्य को अंजाम देने के लिए व्यक्तियों की भर्ती”, तथा “किसी आतंकवादी संगठन को समर्थन प्रदान करने” सहित अन्य आरोपों में गिरफ्तार किया गया था। मार्च 2023 में, जब वे पहले से ही हिरासत में थे, उन्हें ऐसे ही आरोपों के तहत एक दूसरे मामले में भी गिरफ्तार किया गया। इन आरोपों के कथित साक्ष्य मुख्यतः खुर्रम की सूचना-संग्रह गतिविधियों की प्रकृति और उद्देश्य को जानबूझकर विकृत रूप में प्रस्तुत करने पर आधारित प्रतीत होते हैं, जबकि ये गतिविधियाँ घाटी की मानवाधिकार स्थिति के उनके निरंतर दस्तावेजीकरण का हिस्सा थीं। इन दोनों में से किसी भी मामले में अभी तक मुकदमे की सुनवाई शुरू नहीं हुई है।

परवेज़ का मामला एक बार फिर यह उजागर करता है कि यूएपीए का भारतीय सरकार द्वारा राजनीतिक कार्यकर्ताओं, मानवाधिकार रक्षकों और असहमत आवाज़ों को चुप कराने के लिए लगातार उपयोग किया जाता रहा है। इस कानून में जमानत की अत्यंत कठोर शर्तें तथा औपचारिक आरोपपत्र के बिना लंबी अवधि तक हिरासत में रखने का प्रावधान है, जो इसके दुरुपयोग की व्यापक संभावनाएँ पैदा करता है। यूएपीए के अंतर्गत दोषसिद्धि की दर 5 प्रतिशत से भी कम है, और कश्मीर में यह एक प्रतिशत से भी कम है, फिर भी सरकार इस संबंध में उठाई गई चिंताओं को लगातार खारिज करती रही है। सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) एक बार फिर इस असंवैधानिक कानून को निरस्त किए जाने की मांग करती है।

मीर शाहिद सलीम (Ph: 9622002001)

उपाध्यक्ष एवं प्रवक्ता


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