सरकार द्वारा शिक्षा के अधिकार को लेकर बरती जा रही लापरवाही

सरकार द्वारा शिक्षा के अधिकार को लेकर बरती जा रही लापरवाही
निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम बना 2009 में तथा 1 अप्रैल 2010 से प्रभावी है को लागू करने में कई लापरवाहियां बरती जा रही हैं।
स्थानीय प्राधिकारी यानी नगर निगम के कर्तव्यों में बताया गया है कि वह प्रत्येक बालक या बालिका को आस-पास के किसी विद्यालय में निःशुल्क एवं अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराएगा। वह सुनिश्चित करेगा कि दुर्बल वर्ग व अलाभित समूह के बालक या बालिका के साथ पक्षपात न हो और इन्हें किसी आधार पर शिक्षा प्राप्त करने से वंचित न किया जाए। किंतु लखनऊ में ही अभी-अभी समाप्त हुए शैक्षणिक सत्र में सिटी मांटेसरी स्कूल, नवयुग रेडियंस, सिटी इण्टरनेशनल, सेण्ट मेरी इण्टर कालेज, विरेन्द्र स्वरुप पब्लिक स्कूल ने उपर्युक्त अधिनियम की धारा 12(1)(ग) के तहत 105 बच्चों को दाखिला नहीं दिया। इनमें से 14 बच्चे, जिनका सिटी मांटेसरी स्कूल की विभिन्न शाखाओं में दाखिला हुआ था, न्यायालय भी गए किंतु न्यायालय ने भी इनके दाखिले का स्पष्ट आदेश नहीं दिया। क्या ये बच्चे यदि अमीर परिवारों से होते तब भी इनके साथ ऐसी ही लापरवाही बरती जाती?
नगर निगम का यह भी कर्तव्य है कि वह अपने अधिकार क्षेत्र में निवास करने वाले चौदह वर्ष तक की आयु के बच्चों का अभिलेख तैयार करेगा ताकि वह अपने अधिकार क्षेत्र में निवास करने वाले प्रत्येक बच्चे का प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश, उपस्थिति व अनुवीक्षण सुनिश्चित कर सके। किंतु नगर निगम को अभी यह जानकारी ही नहीं है कि निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के तहत उसकी कोई जिम्मेदारी भी है।
राज्य सरकार और नगर निगम का कर्तव्य था कि उपर्युक्त अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए तीन वर्ष के भीतर जहां विद्यालय न हों वहां विद्यालय स्थापित किए जाएं। लखनऊ के अंदर सेक्टर पी, बी.एस.यू.पी., वसंत कुंज योजना, दुबग्गा जैसे कई रिहायशी इलाके हैं जहां अभी कोई प्राथमिक विद्यालय नहीं हैं।
नगर निगम का यह भी कर्तव्य है कि वह प्रवासी परिवारों के बच्चों का विद्यालयों में प्रवेश सुनिश्चित करेगा। कानपुर शहर में काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ती एवं भूतपूर्व राष्ट्रपति आर. वेंकटरमन की पुत्री विजया रामचंद्रन की कई शिकायतों के बावजूद कानपुर के कई ईंट भट्ठांे पर काम करने वाले मजदूरों के बच्चों के नाम विद्यालयों में नहीं लिखे जा रहे हैं।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसी बीच ’खूब पढ़ो, आगे बढ़ो’ अभियान की शुरूआत की है और भव्य कार्यक्रम में बच्चों को स्कूल बैग, किताबें, ड्रेस, जूते व मोजे बांटे। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि कोई भी बच्चा स्कूल जाने से छूटने न पाए किंतु यह कैसे होगा यह नहीं बताया। बस एक अच्छी बात यह कही गई कि सरकारी विद्यालयों की सकारात्मक छवि को पुनर्स्थापित किया जाएगा।
लखनऊ में हाल में न्यायमूर्ति सुधर अग्रवाल के फैसले कि सरकारी वेतन पाने वालों के बच्चों का निजी विद्यालय में पढ़ना अनिवार्य हो को लागू कराने के लिए एक अनशन किया गया। सरकार ने इसे नजरअंदाज किया। इसके विरोध में अनशन वापस लेते हुए ऐसे बच्चों के हाथों से जूस पीकर अनशन समाप्त किया गया जो अभी वि़द्यालय जाने से वंचित हैं अथवा शिक्षा के अधिकार अधिनियम की धारा 12(1)(ग) के अंतर्गत जिलाधिकारी के आदेश से शहर के जाने माने विद्यालयों में प्रवेश पाए लेकिन विद्यालयों ने उन्हें दाखिला नहीं दिया। यह शासन-प्रशासन के मुंह पर तमाचा है। क्या योगी बताएंगे कि पिछले शैक्षणिक सत्र में जिन 105 बच्चों के दाखिले के आदेश के बावजूद उपर्युक्त विद्यालयों ने दाखिला लिया ही नहीं, वे दाखिले मुख्यमंत्री कैसे कराएंगे? इस शैक्षणिक सत्र में भी जिन बच्चों के दाखिले का आदेश अभी तक सिटी मांटेसरी स्कूल में हुआ है विद्यालय उनके खिलाफ यह कहते हुए न्यायालय चला गया है कि ये बच्चे पात्र नहीं हैं। यह कैसे हो सकता है कि बेसिक शिक्षा अधिकारी द्वारा सिटी मांटेसरी में कराए गए सभी दाखिले गलत होते हैं? इस विद्यालय द्वारा शिक्षा के अधिकार अधिनियम की खुलेआम जो धज्जियां उड़ाई जा रही हैं उसके खिलाफ शासन-प्रशासन की कोई कार्यवाही करने की हिम्मत है? जगदीश गांधी जो सिटी मांटेसरी के प्रबंधक हैं इन बच्चों को विद्यालय जाने से सीधे वंचित कर रहे हैं।
यह अच्छी बात है कि सरकार अपने विद्यालयों की खोई हुई गरिमा वापस लौटाना चाहती है। लेकिन सिर्फ स्कूल बैग, किताबें, ड्रेस, जूते व मोजे बांटने से यह नहीं होगा। और न ही वृक्षारोपण अभियान से होगा जिसको बच्चों को दाखिला दिलाने के अभियान से जोड़ दिया गया है। हमारा मानना है कि यह तभी सम्भव है जब सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों, जन प्रतिनिधियों व न्यायाधीशों के बच्चे सरकारी विद्यालय में पढ़ने जाएंगे। इनके जाते ही सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता में रातों-रात सुधार होगा जिसका फायदा गरीब जनता को मिलगा जिसका बच्चा भी अच्छी शिक्षा पाएगा। इसका लाभ उन मध्यम वर्गीय परिवारों को भी मिलेगा जो अभी अपने बच्चों को मनमाना शुल्क वसूल करने वाले विद्यालयों में भेजने के लिए मजबूर हैं क्योंकि तब ये लोग भी अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में ही पढ़ाएंगे।
उ.प्र. में यह भी मांग की जा रही है कि गुजरात की तर्ज पर निजी विद्यालयों द्वारा वसूले जाने वाले शुल्क पर सीमा तय की जाए। गुजरात में प्राथमिक के लिए रु. 15,000 सालाना, माध्यमिक व उच्च माध्यमिक के लिए रु. 25,000 तथा विज्ञान से उच्च माध्यमिक के लिए रु. 27,000 सालाना सीमा तय की गई है। उ.प्र. चूंकि गरीब राज्य है इसलिए यहां प्राथमिक के लिए रु. 6,000 व माध्यमिक व उच्च माध्यमिक के लिए रु. 10,000 की सीमा तय किए जाने की मांग रखी गई है।
इधर उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने सरकार के प्रति कठोर भूमिका लेते हुए आदेश दिया कि जब तक सरकारी विद्यालयों के लिए न्यूनतम भौतिक सुविधाएं जैसे बेंच, ब्लैक बोर्ड, कम्प्यूटर, पुस्ताकालय, विज्ञान प्रयोगशाला, लड़के व लड़कियों के लिए अलग साफ शौचालय, पीने के पानी, मध्यान्ह भोजन, दो जोड़ी ड्रेस, गर्मी में पंखों व ठण्डी में हीटर, आदि की व्यवस्था नहीं हो जाती तब तक उत्तराखण्ड सरकार कोई महंगी चीज जैसे महंगी गाड़ियां, ए.सी., फर्नीचर, आदि नहीं खरीदेगी। यादि उत्तराखण्ड सरकार छह माह में ऐसी व्यवस्था नहीं कर पाती तो जनवरी 2018 से शिक्षा विभाग के अधिकारियों को वेतन नहीं मिलेगा।
दूसरी तरफ मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा है कि सरकारी विद्यालयों में अंग्रेजी वर्ग शुरू करने का कोई लाभ नहीं क्योंकि शिक्षकों की पढ़ाने में कोई रूचि नहीं क्योंकि उनके अपने बच्चे निजी विद्यालयों में पढ़ रहे हैं।
लेखकः संदीप पाण्डेय
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