संकट, समाधान और बुद्धिजीवी/प्रेम सिंह

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संकट, समाधान और बुद्धिजीवी

प्रेम सिंह

वर्तमान भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार ने सभी क्षेत्रों को विदेशी पूंजी के लिए खोल दिया है. देश के संसाधनों और श्रम की लूट इस फैसले के साथ जुड़ी हुई है. सरकार के मंत्री संविधान बदलने सहित अक्सर तरह-तरह की संविधान-विरोधी घोषणाएं करते हैं. शिक्षा का तेज़ी से बाजारीकरण और सम्प्रदायीकरण किया जा रहा है. रोजगार की गंभीर समस्या को प्रधानमंत्री ने प्रहसन में बदल दिया है. न्यायपालिका सहित सभी संवैधानिक संस्थाओं को नष्ट किया जा रहा है. प्रधानमंत्री समेत पूरी सरकार अज्ञान, असत्य, अंधविश्वास, पाखंड, षड्यंत्र, घृणा और प्रतिशोध का अधार लेकर चलती नज़र आती है. सरकारी कर्तव्य और धार्मिक कर्मकांड की विभाजक रेखा लगभग मिटा दी गई है. मानवता, तर्क और संवैधानिक मूल्यों का पक्ष लेने वाले नागरिकों की निशाना बना कर हत्या कर दी जाती है. सरकार के साथ सम्बद्ध गैर-राजकीय संगठन/व्यक्ति योजनाबद्ध ढंग से गौ-रक्षा के नाम पर अल्पसंख्यकों की हत्या कर रहे हैं. भीड़ कहीं भी किसी भी नागरिक को पकड़ कर पीटती है या हत्या कर देती है, पुलिस उपयुक्त कार्रवाई नहीं करती. पूरे देश में कानून-व्यवस्था की जगह भीड़ का राज होता जा रहा है. भारतीय-राष्ट्र गहरे संकट में पड़ गया है. कारपोरेट पूंजीवाद और सांप्रदायिक कट्टरवाद के मुकम्मल गठजोड़ से यह संकट पैदा हुआ है. ऐसी गंभीर स्थिति में संविधान और कानून-व्यवस्था में भरोसा करने वाले नागरिकों का चिंतित होना स्वाभाविक है.

भाजपा की केंद्र के अलावा देश के 22 राज्यों में सरकारें हैं. लिहाज़ा, नागरिकों का यह विचार करना भी स्वाभाविक है कि अगले आम चुनाव में इस सरकार को बदला जाए. अगले लोकसभा चुनाव में वर्तमान सरकार को बदलने की दिशा में विपक्ष प्रयास करता नज़र आता है. हालांकि अभी तक वह कोई पुख्ता रणनीति नहीं बना पाया है, जबकि चुनाव में केवल 9 महीने का समय बाकी रह गया है. यह कहा जा सकता है कि विपक्षी एकता के प्रयासों में संकट के मद्देनज़र वाजिब गंभीरता नहीं है. विपक्षी नेता उपस्थित संकट की स्थिति का फायदा उठा कर सत्ता हथियाने की नीयत से परिचालित हैं. लेकिन लोकतंत्र में इसके अलावा कोई चारा नहीं है कि जो विपक्ष मौजूद है, जनता उसीसे बदलाव लाने की आशा करे. भले ही वह मात्र सत्ता के लिए सरकार का बदलाव हो.

हालांकि देश का जागरूक नागरिक समाज विपक्ष के सत्ता की नीयत से परिचालित प्रयास को कुछ हद तक संकट के समाधान की दिशा में मोड़ सकता है. संकट के समाधान की दिशा संविधान-सम्मत नीतियों की दिशा ही हो सकती है. संकट के मद्देनज़र इस सच्चाई को समझने में अब और देरी नहीं करनी चाहिए कि प्रचलित कारपोरेट पूंजीवादी नीतियों के साथ आरएसएस/भाजपा का हिंदू-राष्ट्र ही चलेगा. भारतीय-राष्ट्र संविधान-सम्मत नीतियों के साथ ही चल सकता है, जिन्हें कांग्रेस समेत सभी सेक्युलर पार्टियों और बुद्धिजीवियों ने लगभग त्याग दिया है. हिंदू-राष्ट्र के बरक्स भारतीय-राष्ट्र का पुनर्भव होना है तो कारपोरेट परस्त नवउदारवादी नीतियों की जगह संविधान-सम्मत नीतियां अपनानी होंगी. जागरूक नागरिक समाज चाहे तो यह लगभग असंभव दिखने वाला काम हो सकता है. जागरूक नागरिक समाज विविध बुद्धिजीवी समूहों से बनता है. लेकिन भारत के ज्यादातर धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी करीब तीन दशक बाद भी संकट की सही पहचान करने को तैयार नहीं हैं. समाधान की बात तो उसके बाद आती है. वे नवउदारवादी नीतियों को चलने देते हुए संकट के लिए केवल आरएसएस/भाजपा के फासीवादी चरित्र को जिम्मेदार मानते हैं. धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी इस सदी के पहले दशक तक यह कहते थे कि नवउदारवादी नीतियों से बाद में निपट लेंगे, पहले फासीवाद के खतरे से निपटना जरूरी है. लेकिन यह उनका बहाना ही है. फासीवाद के विरुद्ध उनका संघर्ष 2004 में वाजपेयी के नेतृत्व में और 2014 में मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनने से नहीं रोक पाया है. यानी समाज और राजनीति में साम्प्रदायिक फासीवादी शक्तियां तेज़ी से मज़बूत होती गई हैं. इस सच्चाई के बावजूद धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी उपस्थित संकट का समाधान केवल आरएसएस/भाजपा को सत्ता से बाहर करने में देखते हैं. नवउदारवादी नीतियां अब उनके विरोध का विषय ही नहीं रह गई हैं.

राजनीति को संभावनाओं का खेल कहा जाता है. अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा की हार से संकट के समाधान का मार्ग खुलने की संभावना बनेगी. इसलिए धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों के आरएसएस/भाजपा को परास्त करने के एकल आह्वान की सार्थकता बनती है. भले ही वह नवउदारवादी नीतियों का विरोध हमेशा के लिए ताक पर रख कर चलाया जाए. लेकिन इस संदर्भ में धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों की ईमानदारी (इंटीग्रिटी) का सवाल अहम है. फिलहाल के लिए भी और 2019 के चुनाव में भाजपा की हार हो जाने के बाद के लिए भी. अगर वे आरएसएस/ भाजपा-विरोध के साथ-साथ आरएसएस/भाजपा का समर्थन करने वाले फासीवादी-अधिनायकवादी प्रवृत्तियों से परिचालित नेताओं/पार्टियों का बचाव करते हैं, तो उनके अभियान को विश्वसनीय नहीं माना जा सकता. संकट के प्रति उनकी चिंता भी खोखली मानी जाएगी. बल्कि उनका बुद्धिजीवी होना ही सवालों के घेरे में आ जायेगा. एक ताज़ा प्रसंग लेकर धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों की ईमानदारी की पड़ताल की जा सकती है.

आम आदमी पार्टी (‘आप’) के सुप्रीमो और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पिछले दिनों घोषणा की कि यदि केंद्र सरकर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्ज़ा दे तो वे उसके बदले अगले चुनाव में भाजपा का समर्थन करने को तैयार हैं. हाल में राज्यसभा में उपसभापति के चुनाव में ‘आप’ के सांसदों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया. पार्टी के एक सांसद ने यह बताया कि विपक्ष के उम्मीदवार का समर्थन करने के लिए केजरीवाल की शर्त थी कि राहुल गांधी उन्हें फोन करें. अब केजरीवाल ने घोषणा की है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपानीत एनडीए के खिलाफ बनने वाले विपक्ष के गठबंधन में वे शामिल नहीं होंगे. ज़ाहिर है, केजरीवाल को आरएसएस/भाजपा की तरफ से कोई संकट नज़र नहीं आता – न अभी, न भाजपा के फिर सत्ता में आने से. उनके नज़रिए से देखा जाए तो कहा जाएगा कि देश में कहीं कोई संकट की स्थिति नहीं है, संकट का केवल हौआ खड़ा किया जा रहा है. इसमें केजरीवाल को दोष नहीं दिया जा सकता. उन्होंने एक सामान्य मांग के बदले भाजपा के समर्थन की खुली घोषणा करके एक बार फिर अपनी स्थिति स्पष्ट की है कि राजनीति में विचारधारा अथवा नैतिकता की जगह नहीं होती. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि उन्हें किसी संकट के समाधान से नहीं, सत्ता से लेना-देना है.

धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों ने केजरीवाल के उपरोक्त ताज़ा फैसलों का हल्का-सा भी विरोध नहीं किया है. यह दर्शाता है कि देश और समाज के सामने दरपेश संकट की स्थिति के बावजूद केजरीवाल द्वारा सीधे भाजपा का समर्थन करने से धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों को कोई ऐतराज़ नहीं है. जबकि, ख़ास कर कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी, स्वतंत्रता आंदोलन और स्वातंत्र्योत्तर युग के नेताओं-विचारकों से लेकर समकालीन नेताओं-बुद्धिजीवियों को साम्प्रदायिक सिद्ध करने के नुक्ते निकालने में देरी नहीं करते. लेकिन केजरीवाल का सामना होते ही उनकी सारी तर्क-बुद्धि और वैज्ञानिक दृष्टि अंधी हो जाती है. वे पिछले करीब 5 साल से ‘आप’ और उसके सुप्रीमो के समर्थन में डट कर खड़े हुए हैं. केजरीवाल निश्चिंत रहते हैं कि दिल्ली और पूरे देश के स्तर पर धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी मुख्यधारा और सोशल मीडिया में उनके समर्थन की बागडोर मुस्तैदी से सम्हाले हुए हैं. राजनीतिशास्त्र के कई प्रतिष्ठित विद्वान अंग्रेजी अखबारों और पत्रिकाओं में ‘आप’ और केजरीवाल की राजनीति के समर्थन/दिशा-निर्देशन में अक्सर लेख लिखते हैं. इससे केजरीवाल को अपना पूरा ध्यान सरकारी विज्ञापनों पर केंद्रित करने की सुविधा होती है, जो करदाताओं का धन खर्च करके तैयार किये जाते हैं.

हालांकि दोहराव होगा लेकिन केजरीवाल और धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों से सम्बद्ध कुछ तथ्यों को एक बार फिर देख लेना मुनासिब होगा. केजरीवाल और उनके साथी नेता बनने के पहले यूरोप-अमेरिका की बड़ी-बड़ी दानदाता संस्थाओं से मोटा धन लेकर एनजीओ चलाते थे और मनमोहन सिंह, लालकृष्ण अडवाणी, सोनिया गांधी से ‘स्वराज’ मांगते थे. उनका ‘ज़मीनी’ संघर्ष केवल ‘यूथ फॉर इक्वेलिटी’ का गठन कर दाखिलों और नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था ख़त्म करने की मांग तक सीमित था. इन लोगों ने अन्ना हजारे, रामदेव, श्रीश्री रविशंकर और विभिन्न विभागों के अवकाश-प्राप्त अफसरों, अन्य एनजीओ चलने वालों के साथ मिल कर दिल्ली में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन खड़ा करने की कोशिश की. पहली बार में आंदोलन नहीं उठ पाया. अगली बार सत्तारूढ़ कांग्रेस की बदनामी को आंदोलन की टेक बनाया गया. मीडिया को अच्छी तरह से साधा गया. ‘जो आंदोलन के साथ नहीं है, वह भ्रष्टाचारियों के साथ है’ यह संदेश मीडिया ने घर-घर पहुंचा दिया. बहुत-से परिपक्व जनांदोलानकारी, सिविल सोसाइटी एक्टिविस्ट, प्रगतिशील बुद्धिजीवी, कम्युनिस्ट, समाजवादी, गांधीवादी आंदोलन में शामिल हो गए. पिछले 25 साल की नवउदारवादी नीतियों से लाभान्वित मध्यवर्ग का आंदोलन को अभूतपूर्व समर्थन मिला. आरएसएस ने मौका भांप लिया और अंदरखाने आंदोलन का पूरा इंतजाम सम्हाल लिया. आंदोलनकारियों के गुरु अन्ना हजारे ने शुरू में ही अच्छा शासन देने के लिए पहले नंबर पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, और दूसरे नंबर पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की प्रशंसा की.

‘भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की राख’ से उठ कर ‘आम आदमी’ की नई पार्टी खड़ी हो गई. ‘अन्ना क्रांति’ का अध्याय जल्दी ही समाप्त हो गया; ‘केजरीवाल क्रांति’ का डंका चारों तरफ बजने लगा. कार्पोरेट राजनीति का रास्ता प्रशस्त करते हुए घोषणा कर दी गई कि राजनीति में विचारधारा की बात नहीं होनी चाहिए. पार्टी पर देश-विदेश से धन की बारिश होने लगी. दीवारों पर ‘केंद्र में पीएम मोदी, दिल्ली में सीएम केजरीवाल’ के पोस्टर लग गए. कांग्रेस की सत्ता जाती देख, धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों ने केजरीवाल का दामन कस कर पकड़ लिया. तब से अब तक गंगा में काफी पानी बह चुका है. केजरीवाल के मोदी की जीत सुनिश्चित करने के लिए बनारस से चुनाव लड़ने, वहां गंगा में डुबकी लगा कर बाबा विश्वनाथ के दर्शन करने, मुजफ्फरपुर और दिल्ली के दंगों पर मुहं न खोलने, दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिली सम्पूर्ण जीत पर हवन कर उसे ईश्वर का पुरस्कार बताने, केंद्र सरकार के दिल्ली में औरंगजेब रोड का नाम बदलने के फैसले का आगे बढ़ कर स्वागत करने, दिल्ली का यमुना तट विध्वंस के लिए श्रीश्री रविशंकर को सौंपने जैसे अनेक फैसलों का धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों ने कभी विरोध नहीं किया. वे तब भी चुप रहे जब दिल्ली सरकार के पूर्व कानून मंत्री सोमनाथ भारती ने नैतिक पुलिसगीरी करते हुए मालवीय नगर इलाके में चार विदेशी महिलाओं पर आधी रात में धावा बोला. वे तब भी चुप रहे जब फांसी पर लटकाए गए अफज़ल गुरु की पत्नी अंतिम संस्कार के लिए अपने पति का शव मांगने दिल्ली आई तो ‘आप’ के हुड़दंगियों ने प्रेस कांफ्रेंस में घुस कर विरोध किया. प्रशांत भूषण पर उनके चेंबर में घुस कर हमला करने वाले अन्ना हजारे और केजरीवाल के समर्थक थे, लेकिन धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी कुछ नहीं बोले. वे तब भी चुप रहे जब केजरीवाल ने पार्टी के कुछ समाजवादी नेताओं पर अभद्र टिप्पणी की. तब भी नहीं बोले जब केजरीवाल के समर्थकों ने एक बैठक में समाजवादी नेताओं के साथ हाथापाई की और अंतत: पार्टी से बाहर कर दिया. फासीवादी/अधिनायकवादी प्रवृत्तियों को दर्शाने वाली यह फेहरिस्त काफी लंबी है.

अलबत्ता, धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी समय-समय पर जनता को बताते रहते हैं कि ‘आप’ में कुमार विश्वास और कपिल मिश्रा जैसे संघी तत्व घुसे हुए हैं, जिनका काम केजरीवाल की छवि खराब करना है. गोया वे जानते नहीं कि ‘आप’ अवसरवादी तत्वों का ही जमावड़ा है! इस जमावड़े में संघी, कांग्रेसी, समाजवादी, वामपंथी और तरह-तरह के गैर-राजनीतिक लोग शामिल हैं. धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों का केजरीवाल सरकार के पक्ष में हमेशा तर्क होता है कि वह लोगों द्वारा चुनी हुई सरकार है. गोया केंद्र और अन्य राज्यों की सरकारें लोगों ने नहीं चुनी हैं! कपिल मिश्रा प्रकरण के समय एक लेखिका ने कहा, ‘एक शेर को चारों तरफ से गीदड़ों ने घेर लिया है!’ एक लेखिका बता चुकी हैं कि केजरीवाल जैसा मुख्यमंत्री अन्य कोई नहीं हो सकता. दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के एक अवकाशप्राप्त प्रोफेसर शुरु से केजरीवाल के बड़े गुण-गायक हैं. कोई अवसर, कोई विषय हो, वे अपना व्याख्यान केजरीवाल की स्तुति से शुरू और समाप्त करते हैं. धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों द्वारा केजरीवाल की गुण-गाथा की यह फेहरिस्त भी काफी लंबी है. चुनाव नजदीक आने पर केजरीवाल समर्थक बुद्धिजीवियों ने दिल्ली सरकार के साथ मिल कर एक नया अभियान चलाया है. ‘विकास का गुजरात मॉडल’ की तर्ज़ पर वे शिक्षा और स्वास्थ्य के दिल्ली मॉडल का मिथक गढ़ने में लगे हैं.

तस्वीर का एक पहलू यह भी है कि 15 साल तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित ने दिल्ली और देश भर के धर्मनिरपेक्ष लेखकों-बुद्धिजीवियों को स्वतंत्रता के साथ भरपूर अनुदान, पद और पुरस्कार दिए. एक-एक नाट्य प्रस्तुति पर सरकार ने करोड़ों रुपये खर्च किये. लेखकों के घर जाकर उनका सम्मान किया. बीमारी में सरकार की तरफ से आर्थिक समेत सब तरह की सहायता प्रदान की. लेकिन जैसे ही उनकी हार के आसार बने, लेखकों-बुद्धिजीवियों ने इस कदर नज़रें घुमा लीं, गोया शीला दीक्षित से कभी वास्ता ही न रहा हो! बिना किसी दुविधा के वे शीला दीक्षित को हराने वाले शख्स के ‘भक्त’ बन गए.

भारत में कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी समूह सर्वाधिक संगठित और ताकतवर है. वह आरएसएस/भाजपा के फासीवाद को परास्त करने के आह्वान में प्रगतिशील और वैज्ञानिक दृष्टि के दावे के साथ सबसे आगे रहता है. लेकिन साथ ही केजरीवाल और उनकी पार्टी का भी वह सतत रूप से सबसे प्रबल समर्थक है. (भारत की तीनों आधिकारिक कम्युनिस्ट पार्टियों की भी वही लाइन है.) इसकी गहन समीक्षा में जाने की जरूरत नहीं है. यही देखना पर्याप्त है कि ऐसा है. समझना यह है कि जहां सर्वाधिक संगठित और ताकतवर बौद्धिक समूह सहित ज्यादातर धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी, नवउदारवाद छोड़िये, साम्प्रदायिकता विरोध की अपनी भूमिका ईमानदारी से नहीं निभाते हों, वह देश एक दिन गहरे संकट का शिकार होना ही था. ज्यादा चिंता की बात यह है कि धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी देश को और ज्यादा गहरे संकट की तरफ धकेल रहे हैं. अपने तात्कालिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए वे भाजपा के सामानांतर एक अन्य फासीवादी/अधिनायकवादी सत्ता-सरंचना का पोषण करने में लगे हैं. कारपोरेट पूंजीवादी प्रतिष्ठान आगे की भारतीय राजनीति में यही चाहता है.

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