शैक्षणिक संस्थानों को पीछे ले जाने वाली बातें

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11 सितम्बर, 1893 को स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में अपना प्रसिद्ध भाषण दिया था। भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने इस दिवस को मनाने का फैसला लिया और प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने युवाओं को सम्बोधित किया। खास बात यह है कि विवेकानंद का मूल नाम नरेन्द्र नाथ दत्त है और प्रधान मंत्री व उनका पहला नाम एक ही है। कुछ नरेन्द्र मोदी के समर्थकों ने इस अवसर को ’नरेन्द्र से नरेन्द्र तक’ के रूप में मनाने का सुझाव दिया।

विेवेकानंद ने इस देश के युवाओं को लम्बे समय से प्रेरणा दी है। उनके भाषण विचारोत्तेजक होते थे। उन्होंने कहा कि ’दुनिया के धर्म अपने से बाहर के ईश्वर को न मानने वालों को नास्तिक मानते है लेकिन वेदांत अपने को न मानने वाले इंसान को नास्तिक मानता है। अपनी आत्मा के गौरव को न मानने वाला नास्तिक होता है।’ उन्होंने यह भी कहा कि ’यदि आप मसीहा नहीं हैं तो ईश्वर के बारे में कुछ भी सत्य नहीं है।…. हममें से हरेक को मसीहा बनना पड़ेगा।’

किंतु जब 11 सितम्बर, 2017 देश के विश्वविद्यालयों में मनाया गया तो छात्रों से कहा गया कि उन्हें विवेकानंद का 1893 का भाषण याद कर मंच से सुनाना है। कई छात्रों ने भाषण रटने की जहमत नहीं उठाई तो आयोजकों को कार्यक्रम में छात्रों को यह छूट देनी पड़ी कि यदि वे चाहें तो कागज से देख कर पढ़ लें। हमारे शैक्षणिक संस्थानों का स्तर इतना खराब हो गया है। यदि स्वामी विेवेकानंद इस प्रकार का कार्यक्रम देखते तो शायद अपना माथा पकड़ कर बैठ जाते।

स्वामी विेवेकानंद तो चाहते थे कि हरेक व्यक्ति के अंदर आत्मविश्वास पैदा हो और वह सशक्त बनें किंतु हमारे शैक्षणिक संस्थान नहीं चाहते कि हमारे विद्यार्थी स्वतंत्र रूप से सोचने-समझने लायक बनें। यदि छात्रों को विवेकानंद के भाषण के ऊपर अपनी टिप्पणी करनी होती तो शायद वे अपने दिमाग पर जोर डाल भाषण की कुछ समीक्षा करते। किंतु आश्चर्य की बात है कि विश्वविद्यालय स्तर पर छात्रों से रट कर दोहराने को कहा जा रहा है। यह तो पूरा विचार ही विवेकानंद की सशक्तिकरण की सोच के विपरीत है। छात्रों के अंदर आत्मविश्वास कैसे पैदा होगा जब तक वे अपने दिमाग की विशलेषणात्मक क्षमता को विकसित करने के बजाए सिर्फ स्मृति क्षमता को ही विकसित करेंगे। साफ है कि हमारे शासक छात्रों में नेतृत्व क्षमता विकसित करने के बजाए उन्हें पिछलग्गू ही बनाए रखना चाहते हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जो भाजपा का वैचारिक प्रेरणास्रोत है, ने कभी विेवेकानंद को गम्भीरता से नहीं लिया। अपने शिकागो के ही भाषण में विवेकानंद ने कहा कि ’हम वैश्विक सहिष्णुता में ही नहीं मानते बल्कि हरेक धर्म को सत्य मानते हैं। मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे राष्ट्र से आया हूं जिसने दुनिया के हरेक पीड़ित, हरेक धर्म व राष्ट्र से आए शरणार्थियों को पनाह दी है।’ किंतु भारत के गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि म्यांनार से भगाए गए रोहिंग्यिा मुसलमान शरणार्थी नहीं बल्कि अवैध घुसपैठिए हैं क्योंकि उन्होंने भारत में शरण लेने के लिए कोई आवेदन नहीं जमा किया है। यदि रोहिंग्यिा भारत में शरण के लिए कोई आवेदन भी जमा करें तो लगता नहीं भारत सरकार उन्हें शरणार्थी के रूप में स्वीकार करेगी। सरकार के पास विवेकानंद जैसा बड़ा दिल नहीं है। नरेन्द्र मोदी ने भी हाल में अपनी पहली म्यांमार यात्रा में वहां की विश्वविख्यात नेता आंग सान सू की से रोहिंग्यिा लोगों के विषय पर कोई चर्चा तक नहीं की। जाहिर है भारत का रवैया रोहिंग्यिा लोगों के प्रति संवेदनहीन ही है।

विवेकानंद ने अपने शिकागों के भाषण में यह भी कहा कि ’अलगाववाद व संकीर्णतावाद से कट्टरपंथ का जन्म होता है जिससे होने वाली हिंसा और खून खराबे ने सभ्यताओं को समाप्त कर दिया है। यदि ये हमारे ऊपर हावी न होते तो आज मानव समाज काफी तरक्की कर चुका होता।’ भाजपा के शासनकाल में अलगाववाद, संकीर्णतावाद, कट्टरपंथ व हिंसा बढ़ी है। संघ परिवार से जुड़े लोग कह सकते हैं कि यह विश्व स्तर पर इस्लाम में ऐसी भावनाओं और घटनाओं के उभार की प्रतिक्रिया में हुआ है। किंतु सवाल यह है कि स्वामी विवेकानंद अथवा महात्मा गांधी के विचारों के आधार पर क्या भारत की इससे कोई बेहतर प्रतिक्रिया नहीं हो सकती थी?

यह भी चिंता का विषय है कि भाजपा के वरिष्ठ नेता अवैज्ञानिक व अतार्किक बातें कर रहे हैं। 16 सितम्बर को लखनऊ स्थित संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान के दीक्षांत समारोह में बोलते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ ने बताया कि चीन में इस बात पर शोध हो रहा है कि भगवान गणेश का सिर उनके पिता भगवान शिव द्वारा काट लिए जाने के बाद कैसे शल्य चिकित्सा से उसकी जगह एक हाथी का सिर लगाया गया। उन्होंने छात्रों एवं प्रोफेसरों से कहा कि उन्हें अपने धार्मिक ग्रथों के खजाने में से शोध कार्य की प्रेरणा लेनी चाहिए। उदाहरण के लिए यह पता लगाया जाना चाहिए कि रामायण में लक्ष्मण को पुनर्जीवित करने वाली कौन सी जड़ी बूटी थी? उनके अनुसार डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को प्रक्षेपास्त्रों पर काम करने की प्रेरणा महाभारत से मिली थी। योगी आदित्यनाथ गणित के स्नातक है।

20 सितम्बर को केन्द्र सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्री सत्य पाल सिंह ने नई दिल्ली में आखिल भारतीय तकनीकि शिक्षा परिषद के एक कार्यक्रम में बताया कि शिवाकर बाबूजी तलपडे नामक भारतीय ने हवाई जहाज का आविष्कार राईट बंधुओं से आठ वर्ष पहले कर लिया था। उनके अनुसार रावण के राज्य में पौधों के अंदर एक चंद्रमणि नामक रसायनिक पदार्थ होता था जिससे उन्हें पानी देने की जरूरत नहीं पड़ती थी। उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी के छात्रों को हिन्दू भगवान विश्वकर्मा, पुराणों, आदि के बारे में पढ़ाया जाना चाहिए। सत्य पाल सिंह ने रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की है और भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी रहे हैं।

रा.स्वं.सं. यह नहीं चाहता कि छात्रों में सोचने समझने की क्षमता विकसित हो ताकि वे योगी से यह न पूछ पाएं कि यदि चिकित्सक मानव सिर की जगह शल्य क्रिया से हाथी का सिर लगाने की विधि पता लगा भी लेते हैं तो जो जीव बनेगा उसमें बुद्धि इंसान की होगी अथवा हाथी की? या छात्र सत्य पाल सिंह से यह न पूछें कि यदि भारत के पास हवाई जहाज बनाने का ज्ञान भूतकाल में रहा है तो फ्रांस से रफेल जेट विमान खरीदने के बजाए क्यों नहीं भारत सरकार उस पुराने ज्ञान को पुनर्जीवित करने के लिए पैसा खर्च करती है?

लेखकः संदीप पाण्डेय
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